छत्तीसगढ़ की कामकाजी महिलायें व मानव अधिकार
डाॅण् ;श्रीमतिद्ध बीण् एनण् मेश्राम
;प्राचार्यद्ध प्राध्यापकए राजनीति शास्त्रए शासकीय डाॅण् बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर
स्नातकोत्तर महाविद्यालय डोंगरगांवए जिला . राजनांदगांव ;छण्गण्द्ध
ष्ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्ण्उंपसरू बवससमहमण्इेइंध्हउंपसण्बवउ
शोध सारांशरू
नारी समाज की महत्वपूर्ण अंग है। वह परिवार की जीवनदायिनी संजीवनी शक्ति है। समाजीकरण की प्रक्रिया नारी पर पूर्ण रूप से अवलम्बित है। संतति के जन्म पोषण संरक्षण और चरित्र निर्मात्री के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर नारी समाज और राष्ट्र के निर्माण और विकास का पथ प्रशस्थ करती है। नारी के उपेक्षित होने से समाज के विकास की प्रक्रिया अवरूद्व हो जाती है। महिलायें परिवार की नींव होती हैए वह परिवार को चलाने व परिवार की उन्नति में सहायक होती है। जिस परिवार में महिला का सहयोग नहीं होताए वह परिवार बिखरी हुई स्थिति में रहता है।भारतीय समाज में महिला जागरण और उन्नति के समर्थकों की कमी नहीं। वर्ष 2001 को महिला वर्ष तथा 2003 को महिला सषाक्तिकरण वर्ष के रूप में मनाकर देष में महिला वर्ग को जिस प्रकार लुभाने की कोषिष की हैए उसे देखकर आश्चर्य होता है कि आज 21 वीं सदी तक भारतीय महिलाओं को समाज में उनका स्थान नहीं मिल सका जिसकी वास्तव में हकदार है।
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प्रस्तावनाः.
छत्तीसगढ़ में कार्य करने वाले महिला को कानुनी संरक्षण प्राप्त होना जरूरी है। चाहे मजदुरी करने वाले हो या बड़े पदों पर कार्य करने वाले हों उनके पद व प्रतिष्ठा के अनुरूप उनके अधिकारों को सुरक्षित किया जाना आवश्यक है।
;1द्ध शिक्षा का अवसर .
;2द्ध पारिवारिक सम्मान
;3द्ध शषण द्वारा दी जाने वाली सुविधा
;4द्ध मानसिक व शारीरिक शोषण न हो
;5द्ध नारी सम्मान व स्वस्थ्य संबंधी सुविधा
ये सारी बातें उसे आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है।
भारतीय परम्पराओं में कन्या को दूसरों की अमानत और पराया धन मानने के कारण अभिभावक लड़कियों का विवाह शीघ्र कर देते थे। आज भी कहीं न कहीं यह स्थिति देखने को मिलती है जिससे लड़कियों का शोषण हर तरह से होता है। लेकिन वर्तमान समय में शिक्षा का विकास व आर्थिक क्षेत्र में स्वावलंबी होने की प्रक्रिया के साथ ही साथ महिलाओं के जीवन में अनेक परिवर्तन देखे गए हैं।
छत्तीसगढ़ की नारी के संबंध में देखा जाये तोए यहां की नारियां सहनशीनए कर्मठए जुझारू व सुसंस्कृत होती है। लेकिन समाज पितृसत्तात्मक होने के कारण महिलाओं की स्थिति बहूत अच्छी नहीं हैए वे प्रायः पुरूषों के दमन का शिकार होती हैं। इस पुरूष प्रधान समाज में यह जानते हुए भी कि महिलाओं के बिना किसी भी क्षेत्र में विकास संभव नहीं हैए फिर भी महिलाओं को पूरी तरह सम्मान नहीं मिल पाता और महिलायें सभी जगह अपमानित हो रही हंै।
वर्तमान समय में षिक्षाए औद्योगिक संस्कृति समाजिक वातावरण में परिवर्तन में परिणाम स्वरूप धीरे.धीरे जागरूकता बढ़ रही है। आज महिलाऐं उच्च षिक्षा प्राप्त कर अपने आपको समाज के सामने ऐसी भूमिका में प्रस्तुत करने की कोषिष कर रही हैंए कि यदि समाज उस पर अत्याचार करने की कोषिष भी करता है तो वह उसका सामना करने की शक्ति व हिम्मत रखें।
आज महिलायें परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए अनेक क्षेत्र में कार्य करने को हमेशा तैयार रहती हैं। राजनीतिक क्षेत्र मेंए शासकीय क्षेत्र में एवं अषासकीय क्षेत्र मेए साथ ही मजदूरी करने के लिए भी तैयार रहती हैं। महिलायें परिवार की समस्त जिम्मेदारी को पूरा करने के साथ ही दफ्तरों में कार्य करते हुए अपने परिवार को सुरक्षा प्रदान करती है।
दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं को अनेक प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। कभी.कभी ऐसी स्थिति निर्मित होती हैए कि वह अपने आप को असहाय महसूस करती है। दफ्तर में अधिकारी के द्वारा मानसिक व शारीरिक षोषण होता है। कई घटनायें सामने आई है। कई महिलायें बदनामी के डर से शोषण का षिकार होती रहती हैं और कई महिलायें कानून का सहारा लेकर सजा दिलवाना चाहती हैं।
कई परिवार ऐसे भी हैं जहाॅं किए बहूएॅं नौकरी कर रही हैं। उसके बावजूद भी परिवार वाले उसे दहेज के नाम से प्रताड़ित करते हैं। कई महिलाऐं दहेज को लेकर असमायिक मृत्यु का शिकार होती है।
कामकाजी महिलाओं को दोहरा तनाव झेलना पड़ता है। एक तरफ नौकरी का दबाव व दूसरी तरफ जल्दी घर लौटने और घर की जिम्मेदारियों को पूरा करना इसके लिए उसे जुझना पड़ता है। आराम के लिए उसे समय नहीं मिल पाता। रसोई से लेकर दफ्तर तक सारी परेशानियों को अकेले ही झेलना पड़ता हे। दूसरी तरफ पति के रूप में पुरूषए स्त्री को उतनी ही स्वतंत्रता देना चाहता हैए जितना एक पिंजरे में किसी पक्षी को। जिसके कारण महिलाओं के मन व मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
शताब्दियों से बड़े परिवार में स्त्रियों पति के परिवार की दास रही हैं। बहूंओं के साथ सासए ससुरएजेठए जेठानीएननंद व देवर क साथ.साथ पति का व्यवहार भी अच्छा नहीं रहा है। अत्याचार व यातनायें भोगने के लिए शायद स्त्रियों ही बनाई गई हैंए क्योंकि वे पुरूषों पर आश्रित हैं। लेकिन अब महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न हुई है।
स्वतंत्रता पश्चात् स्त्री समाज में अनेक अधिकारों और कत्र्तव्यों के प्रति नयी चेतना व जागृति उत्पन्न हुई। लेकिन फिर भी महिलाओं को आजपर्यन्त संघर्ष करना पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ के कामकाजी महिलाओं ने अपने अधिकारों के प्रति जागरूता लाने के लिए कड़ा संघर्ष किया हैए फिर भी वह पूर्ण रूप से अपने अधिकारों को प्राप्त नहीं कर पायी है। कामकाजी महिलाओं को पुरूष के समान समाज में न तो आगे बढ़कर हर काम करने का अधिकार है और न ही स्वतंत्रता के साथ कोई काम कर सकती है। समाज का भयए परम्परायेंए रीति.रिवाजए महिलाओं को अनेक मामलों में प्रतिबंध थे। आज भी देखने को मिलता है जो स्वतंत्रता समाज में पुरूषों को प्राप्त हैए वो महिलाओं को नहीं हैं।
मनु ने नारी के लिए कहा था कि पति चाहे कैसा भी हो उसे देवता के समान पूजे। लेकिन आज के युग में ऐसा कोई मनु दिखाई नहीं देता जो ये कहें किए पुरूष भी पत्नि को देवी के समान समझे। जहाॅ पुरूष को देवता बनने का अधिकार है तो नारी को देवी बनने का अधिकार वास्तविक रूप में प्राप्त क्यों नहीं हैं घ् जहाॅं एक ओर नारी को गृह स्वामिनीए अर्धांमिनी और देवी जैसी उपमाओं से सुषोभित किया जाता है वहीं दूसरी ओर वह निर्भरता की स्थिति में देखी जाती है।
वैवाहिक जीवन में महिलाओं को हमेशा सामन्जस्य करना पड़ता है जिससे उसमें तनाव व संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। छत्तीसगढ़ में कामकाजी महिलायें अपने अधिकारों का पूरी स्वतंत्रता के साथ उपयोग नहीं करती है। क्योंकि उसे पति व परिवार से ही पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम करने का अधिकार नहीं मिल पाता है। दूसरी तरफ शषन से जो अधिकार व सुविधाऐं उसे चाहिए और ऐसे नियम व कानून बनने चाहिएए जिससे महिलायें अपने अधिकारों को प्राप्त कर सकें व पूरी स्वतंत्रता के साथ उसका उपयोग कर सके। उसके मार्ग में बाधा डालने वाले व उसका शोषण करने वालों को कठोर सजा दिया जाना चाहिए। तभी छत्तीसगढ़ की महिलायें पूरे मन व लगन से मनुष्य के लिए क्षमाएत्याग और अहिंसा जीवन के उच्चतम आदर्श है। नारी इस आदर्ष को प्राप्त कर चुकी हैं।
सदंर्भः.
1ण् छत्तीसगढ़ का शासन एवं राजनीति.डाॅण्डीण्एमण्बघेल
2ण् महिला एवं विकास . डाॅण्राजकुमार
3ण् नव भारत . नारी विषेषांक
4ण् पत्रिका मनोरमा . नारी विषेषांक
Received on 04.08.2018 Modified on 21.08.2018
Accepted on 25.09.2018 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4):554-556.